पंडित जवहरलाल नेहरू के प्रेरणादायक प्रेरक प्रसंग | Pandit jawaharlal nehru short stories in hindi

पंडित जवहरलाल नेहरू


1. पंडित नेहरू जी का वजन

एक बाल सभा के अवसर पर पंडित नेहरू बालक-बालिकाओं के बीच प्रश्नोत्तर का आनंद ले रहे थे। तभी एक लड़की ने प्रश्न किया - "क्या आपने कभी अपना वजन लिया है ?" पंडित नेहरू ने तुरंत उत्तर दिया- "अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखने के कारण मैंने अनेक बार वजन लिया है। बालिका ने फिर प्रश्न किया-"अच्छा बताइए, आपका सबसे ज्यादा और सबसे कम वजन कब और कितना था?"

नेहरू ने बिना रुके कहा- "मेरा सबसे ज्यादा वज़न एक सौ बासठ पौंड उस समय था जब मैं अहमदनगर जेल में था और सबसे कम साढ़े सात पौंड वजन जब मैं पैदा हुआ तब था।" बालिका ने ताज्जुब से पुछा - 'जेल में तो वजन कम हो जाना चाहिए परंतु बढ़ कैसे गया?"

पंडित नेहरू ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा - "उस समय मेरा वजन इस खुशी में बढ़ गया कि मैं अपने देश की सेवा में जेल का कष्ट सहन कर रहा हूँ।"



2. जंगल का फूल

एक दिन पंडित जवाहरलाल नेहरू जी ने शास्त्री जी को जंगल का फूल कह दिया।

शास्त्री जी ने उत्तर दिया-"पंडित जी, जंगल में जो आजादी और स्वच्छता है, वह बगीचे में कहाँ?"

तभी नेहरू जी ने जवाब दिया “पुजा में बगीचे के फूल ही उपयोग होते है, जो देवों के शीश पर चढ़ते है”

स्वाभाविक हास-परिहास में शास्त्री जी ने उत्तर दिया - "देवता के सिर पर चढ़ने की अपेक्षा, क्या विश्व-कल्याण के लिए सुगंध बिखेरना कम है। फूल देवताओं के लिए ही क्यों खिले, क्या दूसरे जीव तुच्छ हैं?"



3. निहत्वा घूमने वाला

देश विभाजन के समय ऐसा लग रहा था मानो लोगों के हृदय भी विभाजित हो गए हैं। सांप्रदायिक दंगे अपनी चरम सीमा पर पहुंच गए थे। एक जाति दूसरी जाति को खाने के लिए तैयार हो गई। जीवन का कोई मूल्य न रह गया।

उस समय दिल्ली में दंगों या केंद्र बना हुआ था। हर गली, सड़क पर लाशों के ढेर लगे थे। मकानों में आग लगाई जा रही थी। दुकानें लुट रही थीं। कुछ लोग एक जूते की दुकान में घुस गए। और देखते ही देखते वह दुकानदार तो जान बचाकर भाग गया।

गुंडे जूते ले ले कर इधर-उधर दौड़ने लगे। एक दबंग, निहत्था आदमी अचकन और चूड़ीदार पाजामा पहने हुए दनदनाता हुआ दुकान में घुस आया। उसे देखते ही लोग जहाँ थे वही खड़े रह गए। हाथ फिर जूतों के जोड़ों को न उठा सके। फिर भी एक धृष्ट आदमी जूते लेकर भाग खड़ा होता है। वह व्यक्ति अपने सामने दुकान लुटते कैसे देख सकता था।

उसने दौड़कर जो ललकार लगाई कि वह जूते वहीं छोड़ जान बचाकर भागा। फिर तो उस सफेद पोश व्यक्ति ने बिखरे हुए जूते उठाकर दुकान में रखे। यह दबंग व्यक्तित्व और किसी पुरुष का नहीं वरन् जवाहरलाल नेहरू का था, जो सांप्रदायिक दंगों की लपटों के बीच भी अकेले घूम रहे थे।



4. कायरता

पंडित जवाहरलाल नेहरू को कायरता से बड़ी घृणा थी। एक बार जब वह कुरुक्षेत्र में पाकिस्तान से आए विस्थापितों से मिलने गए, तो कुछ बेघर लोगों ने उनके सामने अपनी शिकायतें सुनानी चाहीं। वे उनकी कार के आगे लेट गए।

पंडित जी ने कार रोक दी और नीचे उतरकर लेटे हुए लोगों में से एक को दो थप्पड़ दे मारे । बाद में उन्होंने अपने भाषण में कहा, “आज जब मैं यहाँ आया, तो कुछ लोग मेरी कार के आगे लेट गए। यह मुझे बिलकुल पसंद नहीं। इस प्रकार कार के आगे लेटना हद दर्जे की कायरता है। अगर कोई शिकायत है, तो मेरे पास आइए, मैं आपकी बात सुनूंगा, पर इस तरह की कायरता मैं कभी सहन नहीं करूँगा।"



5. बहस

पंडित जवाहरलाल नेहरू और एक व्यक्ति के बीच किसी विषय पर बहस हो गई। वह बार-बार यह जताने का प्रयास कर रहा था कि उनके विचार गलत हैं, पर उसे सफलता नहीं मिल रही थी।

अंत में हारकर उसने कहा, "पंडित जी, आप शायद भूल रहे हैं कि हर समस्या के दो पहलू हुआ करते हैं, एक गलत और एक सही।

नेहरू जी ने तपाक से उत्तर दिया, "अच्छा, तो महज इसीलिए आप गलत पहलू का समर्थन कर रहे हैं।" यह सुनकर वह बेचारा चुप हो गया।

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