स्वामी विवेकानंद जी के 9 प्रेरणादायक प्रेरक प्रसंग | swami vivekanand ke prerak prasang in hindi

स्वामी विवेकानंद जी के 9 प्रेरणादायक प्रेरक प्रसंग | swami vivekanand ke prerak prasang in hindi


1. प्रेरक प्रसंग - परोपकार के लिए स्वयं संकट में


स्वामी विवेकानंद इंग्लैंड कि यात्रा पर थे। एक दिन वे अपने कुछ मित्रों के साथ देहात का भ्रमण करने के लिए निकले। तब अचानक एक साँड़ उधर से दौड़ता हुआ आया। उसे आता देख उनके साथ के लोग हड़बड़ाकर इधर-उधर भागने लगे।

इस भगदड़ में एक छोटी-सी लड़की टक्कर खाकर नीचे गिर गई। वह साँड़ उस बालिका की ओर ही आ रहा था। स्वामीजी यह देखकर सावधान हो गए और दौड़कर साँड़ के सामने डट गए।

साँड़ एकदम रुक गया और दूसरी ओर चला गया। बच्ची के बचाव के लिए अपने आप को खतरे में डालने वाले स्वामी जी का यह साहस देखकर उनके सब साथी चकित रह गए।


2. प्रेरक प्रसंग - मनुष्य की पहचान


स्वामी विवेकानंद एक बार अमेरिका की एक सड़क से गुजर रहे थे। स्वामी जी ने गेरुआ वस्त्र धारण किया हुआ था। उनकी विचित्र वेश-भूषा देखकर लोगो ने समझा, यह कोई मूर्ख है। उनके पीछे लोग उनकी हँसी-मजाक बनाने लगे।

स्वामी जी थोड़ा चलकर रुके और भीड़ की ओर देखते हुए बोले–“सज्जनों ! आपके देश में सभ्यता की कसौटी पोशाक है, पर मैं जिस देश से आया हूँ वहाँ कपड़ों से नहीं, मनुष्य की पहचान उसके चरित्र से होती है।" स्वामी जी के तेजस्वी वचन सुनकर सारी भीड़ स्तब्ध रह गई। स्वामी जी सहज भाव से आगे बढ़ गए।


3. प्रेरक प्रसंग - लोक-सेवा का महत्त्व


काशीपुर के उद्यान गृह में जिस समय वे अपने गुरु की अंतिम परिचर्या कर रहे थे, स्वामी विवेकानंद को गुरु की कृपा से ईश्वरीय दर्शन के साथ सत्त्वज्ञान प्राप्त हो गया। आलोक प्राप्त होते ही स्वामी विवेकानंद के मन में विचार आया, कि बस अब मैं सारा संसार त्यागकर एकमात्र समाधिस्थ होकर, परमानंद का अनुभव करता हुआ संपूर्ण जीवन बिताऊँगा।

अंतर्यामी गुरु ने यह बात जान ली और बोले-"विवेक ! तुम्हारा यह स्वार्थ पूर्ण परमार्थ उचित नहीं। अभी तुम्हें छुट्टी नहीं है। संसार से अज्ञान दूर करने का बहुत बड़ा काम तुम्हें करना है। एकांत में बैठकर आत्म-सुख का आनंद तुम्हें नहीं लेना है।"

संसार में कोई प्रयोजन न रहने पर भी स्वामी विवेकानंद ने गुरु आज्ञा को शिरोधार्य किया और ब्रह्मानंद में लीन होकर बैठ जाने की बजाय लोक सेवा में लग गए।


4. प्रेरक प्रसंग - धन नहीं मान चाहिए

स्वामी विवेकानंद के पिता ने जिस बहुतायत से धन कमाया, उससे अधिक तत्परता से उसे खर्च भी कर डाला। जब उनका स्वर्गवास हुआ, तब परिवार के गुजारे के लाले पड़ गए। स्वामी विवेकानंद उस समय बी ए पास कर चुके थे, किंतु बहुत प्रयत्न करने पर भी उन्हें कोई नौकरी न मिल सकी।

उनकी माँ और छोटे भाई-बहनों को भूखे रहने की नौबत आ गई। स्वामी विवेकानंद परेशान होकर अपने गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस के पास गए और अपनी व्यथा सुनाई। श्री रामकृष्ण ने उनसे कहा-"आज तुम काली माता से जो कुछ माँगोगे वह सब मिल जाएगा, जाओ माँग लो जाकर।"

स्वामी विवेकानंद आधी रात के बाद माता के मंदिर में गए, किंतु हाथ जोड़कर प्रार्थना के लिए खड़े होते ही वे अपने लौकिक स्वार्थ को भूल गए, और माँगने लगे-"माँ ! मैं और कुछ नहीं चाहता, मुझे केवल ज्ञान दे. भक्ति दे, विवेक दे और वैराग्य दे। श्री रामकृष्ण ने उन्हें तीन बार माँ के पास भेजा किंतु वे एक बार भी रुपया-पैसा न माँग सके।


5. प्रेरक प्रसंग - बिगड़े हुए को क्या बनाएगा

बालक विवेकानंद माता-पिता का बड़ा लाड़ला बेटा था। किसी शैतानी पर डांटा न जाता, बल्कि बड़े प्यार से समझाया ही जाता था। एक बार किसी बात पर माँ ने डाँट दिया, बस फिर क्या था, विवेकानंद का उपद्रव तोड़-फोड़ में बदल गया।

तमाम चीजें फेंकने फैलाने और तोड़ने-फोड़ने लगा। माँ ने तत्काल अपनी भूल सुधारी और विवेकानंद की प्रवृत्ति के अनुकूल मीठे स्वर में बोली-"बिले, जब तू बने हुए को बिगाड़ता है, तो बिगड़े हुए को क्या बनाएगा?" बालक का उत्पात तत्काल बंद हो गया और मुख पर लज्जा का भाव लिए हुए सारी चीजें समेट सँजोकर रखने लगा।


6. प्रेरक प्रसंग - अनंत उदारता

बालक विवेकानंद की माता उनकी अनंत उदारता से तब जरूर कुछ परेशान हो उठीं, जब घर की कोई भी वस्तु अदेय नहीं रही और भिखारियों को पैसा न होने पर बासन-वसन दिए जाने लगे और भिखारी ! उन्होंने तो दाता का द्वार देख ही लिया था।

एक दिन शरीर के वस्त्र उतारकर दे देने पर माँ ने विवेकानंद को ऊपर कमरे में नंगा ही बंद करके बाहर से कुंडी लगा दी, विवेकानंद खिड़की के पास खड़ा सड़क पर देख रहा था। एक भिखारी ने दाता को पहचाना और आवाज लगाई। विवेकानंद ने उसे रोक तो लिया, पर कमरे में देने को कुछ था ही नहीं। चेहरे पर उदासी आई ही थी, कि देखा माँ का एक बकसा बिना ताले के रखा था।

बस फिर क्या था, अर्थी और परमार्थी दोनों का काम बन गया। विवेकानंद ने दो बेशकीमती साड़ियाँ निकाली और खिड़की के रास्ते भिखारी के फैले हुए हाथों पर फेंक दी। भिखारी का आशीर्वाद सुनकर माँ आई और देखा कि दाता प्रसन्न था और भिखारी निहाल ! माँ अपने उपाय की असफलता पर हँसती हुई बोली-"तू संसार को सर्वस्व दिए बिना न मानेगा।"


7. प्रेरक प्रसंग - मनुष्यता के रक्षक

कलकत्ता में स्वामी रामकृष्ण मठ की स्थापना हो चुकी थी। उनके सारे भक्त संन्यास लेकर मट में प्रवेश कर चुके थे। मठ का सारा काम मठ में लगी जमीन से चलता था। तभी कलकत्ते में प्लेग का प्रकोप हुआ। लोग बुरी तरह मरने और बीमार होने लगे।

स्वामी विवेकानंद जी से यह न देखा गया और उन्होंने मठ को सुश्रूषा शिविर में बदल दिया। सारे अध्यात्म साधकों को सेवा कार्यों में लगा दिया और कहा-"आज भगवान् ने अपने सच्चे भक्तों और सच्चे संन्यासियों की परीक्षा ली है। आज मनुष्यता और महामारी के बीच संग्राम छिड़ गया है।

आज मठ के प्रत्येक संन्यासी को अपनी सच्चाई का प्रमाण देना है। ऐसी सेवा करो, इतनी परिचयाँ करो, इतनी सहानुभूति बरसाओ कि मठ में आया हुआ कोई भी रोगी मृत्यु से पराजित न होने पाये। धन की कमी होने पर मठ की भूमि बेच दूंगा, चिंता न करना। स्वामीजी की प्रभावोत्पादक पुकार पर संन्यासी जीवन के देवदूतों की भाँति रोगियों की सेवा में जुट गए।


8. प्रेरक प्रसंग - सारूप्य

स्वामी विवेकानंद मदास गए हुए थे। कानून शास्त्र के एक कॉलेज का अवलोकन करते हुए, उनकी दृष्टि दीवार पर लगे श्रीकृष्ण के चित्र पर पड़ी। अनजाने ही वे एक विद्यार्थी से पूछ बैठे-"कृष्ण भगवान् के चित्र में नीले आसमानी रंग का प्रयोग क्यों किया जाता है ?"

विद्यार्थी ने तुरंत उत्तर दिया- "जिस प्रकार आकाश का विस्तार अनादि और अनंत है, उसी प्रकार श्रीकृष्ण के गुणों की भी कोई सीमा नहीं। इसीलिए आसमानी रंग का उपयोग किया जाता है।"

इस गूढ रहस्यमय उत्तर को सुनकर स्वामी जी बहुत प्रसन्न हुए। वही विद्यार्थी आज चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य के नाम से सुविख्यात है।


9. प्रेरक प्रसंग - भूत

नरेंद्र अपने मित्रों के साथ एक पेड़ पर चढ़कर खेल रहे थे। पेड़ का स्वामी उधर से निकला, तो उसे इस बात की चिंता हुई कि यह बच्चे बार-बार ऊपर-नीचे चढ़ते-उतरते हैं, कहीं ऐसा न हो कि असावधानी के कारण कोई गिर जाए और उसके चोट लग जाए।

उस व्यक्ति को एक तरकीब सूझी, उसने उन बच्चों के लीडर नरेंद्र से कहा-"देखो बेटे ! तुम्हें शायद मालूम नहीं है। इस पेड़- पर एक भूत रहता है। जो बच्चे उस भूत को परेशान करते हैं। वह उनके हाथ-पैर तोड़ देता है। अत: मेरी सलाह यह है कि तुम सब भी नीचे ही खेलो।" भूत का नाम सुनते ही नरेंद्र के सब साथी एक-एक कर खिसक गए।

नरेंद्र अकेला ही उस पेड़ पर खड़ा रहा और साहस के साथ बोला-"प्यारे मित्रों! यह सज्जन झूठ बोलते हैं, देखो मैं तुम लोगों के सामने अकेला इस पेड़ पर खड़ा हूँ। यदि भूत हो तो मेरे सामने आए, मैं उसका सामना करने के लिए तैयार हूँ।" भूत नहीं आया, हाँ, इस बच्चे के साहस और दृढ़ता ने उसे इतना आगे बढ़ाया कि वे बाद में स्वामी विवेकानंद के नाम जाने जाते है।

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