8 शिक्षाप्रद प्रेरणादायक प्रेरक प्रसंग | Best Motivational Prerak Prasang in Hindi

8 शिक्षाप्रद प्रेरणादायक प्रेरक प्रसंग | Best Motivational Prerak Prasang in Hindi

1. स्वर्ग प्राप्ति का राजमार्ग

एक दिन एक व्यक्ति ने महात्मा रामानुज से पुछा कि "महात्मा क्या कोई ऐसा मार्ग है जिसके कारण ये संसार भी न छोड़ना पड़े, और स्वर्ग भी पा लूँ।"

राम तनज ह ने कहा और बोले- "हाँ, ऐसा मार्ग है, तुम जो भी भी कमाओ, ईमानदारी से कमाओ और जो कुछ व्यय करो, दूसरों के भलाई के लिए करो।" उस व्यक्ति को संदेह हुआ उसने पूछा "लेकिन ऐसे कठिन मार्ग पर कौन जा रहा है। हो सकता है? "रामानुज ने दृढ़ विश्वास के साथ कहा" जो नारकीय या साधनों से बचना चाहता है और जिसे ईश्वर प्राप्ति की सच्ची लगन होगी। "


2. सबसे बढ़कर उपासना

लोकमान्य तिलक कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने के लिए लखनऊ आए थे। लखनऊ में कांग्रेस का कार्यक्रम बहुत व्यस्त था। सभी लोग अपने अपने काम कर रहे थे। क्योंकि उसी दौरान विभिन्न दलों और गुटों में एकता स्थापित करने के लिए बातचीत हुई थी।

भोजन के समय परोसने वाले स्वयंसेवक ने कहा "महाराज आज तो आपको बिना पूजा किए ही भोजन करना पड़ा।"

लोकमान्य संत हो गए ओर बोले “अभी तक जो हम कर रहे थे, क्या वह पूजा नहीं थी? क्या घंटी-शंख बज़ाना और चंदन घिसना ही पूजा है? समाज-सेवा से बढ़कर और कौन-सी पूजा हो सकती है? ”


3. मैं तो बापू का चपरासी हूँ

बिहार के चंपारण जिले में महात्मा गाँधी का शिविर लगा था। किसानों पर होने वाले सरकारी अत्याचारों की जाँच चल रही थी। हजारों की तादाद में किसान आ-आकर बापू से अपने दुःख निवेदन कर रहे थे। उस समय उस जाँच आंदोलन में कृपलानी जी का बड़ा प्रमुख सहयोग था।

वे गाँधी जी के कैंप से सचिवरी के रूप में काम कर रहे थे। इसलिए जिला अधिकारियों की आंख की किरकिरी बनी हुई थी। इस जाँच-पड़ताल के दौरान महात्मा जी को कई चिट्ठियाँ दिन में बहुत बार कलेक्टर के पास भेजनी पड़ती थी। यह सब डाक ले जाने का काम कृपलानी जी ही करते थे।

कृपलानी जी को डाक लाते-ले जाते देखकर एक बार कलेक्टर ने पूछा "आप तो वहीं प्रो। कृपलानी हैं, जो इस सब हलचल के मुखिया हैं। फिर आप यह डाक का काम क्यों करते हैं?

कृपलानी जी ने उत्तर दिया," मैं तो? एक साधारण कार्यकर्ता और बापू का चपरासी हूँ। "

कृपलानी जी का उत्तर सुनकर कलेक्टर ने महात्मा गाँधी की महानता को समझा और आंदोलन की गरिमा का अंदाज लगाया।


4. सच्चा मेहमान

महाराष्ट्र के संत श्री एकनाथ जी को 6 मसखरे व्यक्ति हमेशा उन्हें तंग किया करते थे। एक बार एक भूखा ब्राह्मण उस गाँव में आया और उन्हीं मसखरे व्यक्तियों से भोजन की याचना की।

गाँव के उन्हीं मसखरे व्यक्तियों ने उस भूखे ब्राह्मण से कहा कि "अगर तुम संत एकनाथ को क्रोधित कर दो, तो हम तुम्हें 200 रूपए देंगे। हम तो हार चुके शरारत कर के पर उन्हें गुस्सा ही नहीं आता।"

ब्राह्मण भूखा था तो यह मौका कहां चूकने वाला था। फौरन उनके घर गए, वहाँ वे नहीं मिले तो मंदिर में जा रहे थे, जहाँ पर वे ध्यान मग्न बैठे थे।

वह ब्राह्मण बन उनके कंधे पर बैठ गया। संत ने अपनी आंखे खोली और शांत मुद्रा में बोले- "ब्राह्मण देवता: अतिथि तो मेरे यहाँ नित्य ही आता है, किंतु आप जैसा स्नेह आज तक किसी ने नहीं जताया। अब तो आपको मैं बिना भोजन किए वापिस नहीं जाऊँगा।"


5. दृष्टिकोण

एक दार्शनिक से किसी ने पूछा - "आप इस दुःखी और असंतुष्ट संसार के बीच सुखी और संतुष्ट कैसे हैं?"

उन्होंने उत्तर दिया - "मैं अपनी आँखों का सही उपयोग जानता हूँ। जब मैं ऊपर देखता हूँ, तो मुझे स्वर्ग याद आता है, जहाँ मुझे जाना है। नीचे देखता हूँ तो यह सोचता हूँ कि जब मेरी कब्र बनीगी, तो बहुत कम जगह लगेगी। और जब मैं दुनिया में चारों ओर देखता हूं तो मुझे मालूम होता है कि करोड़ों आदमी ऐसे हैं, जो मुझसे भी दुःखी हैं। उसी तरह मैं संतोष पाता हूं। "


6. मेरा पड़ोस का उपहार

आइजन हावर अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए थे। इस उपलक्ष्य में उन्हें देश-भर से लाखों उपहार मिले। ये उपहारों में एक मामूली झाडू भी था।

भेजने वाले ने लिखा था, "आपने अपने भाषण में कहा था कि अगर मैं सुनता, तो मेरा काम राज्य लोकतंत्र में पूर्वाचार कचरा को साफ करना होगा। मुझे विश्वास है कि मेरा यह नन्हा-सा उपहार आपको दुःख देता है कि आपके वचन की याद दिलाता रहेगा। "

इन उपहारों की ऋषिनी का उद्घाटन करते राष्ट्रपति ने कहा कि झाडू को ऊँचा उठाते हुए कहा "यह मेरा सबसे अच्छा उपहार है! देश की आत्मा ने मुझे सीधी बात-चीत की है।"


7. सच्ची देश भक्ति

अण्णा साहब जापान की यात्रा पर गए, तो अपने एक दोस्त के लिए यहां से आम भी ले गए। जापान पहुंचने पर वहा के एक अधिकारी ने यह जानना चाहा कि उसमें क्या है।

तब अण्णा साहब ने जवाब दिया कि - "इसमें भारत का सबसे मधुर फल आम है, यह मैं अपने एक दोस्त के लिए लाया हूं।"

उस अधिकारी ने यह कहकर पूरे आम तौर पर कर दिया कि "ऐसे श्रेष्ठ पैरों को खाकर जापानी इस बात का प्रयत्न करेंगे कि उन्हें यह फल खाने को मिलें। ऐसी स्थिति में वे भारत से मँगाने का प्रयत्न करेंगे और यहाँ का धन विदेश जाना लगेगा, जो उचित नहीं है। "


8. अपनी स्थिति का ध्यान

दक्षिण भारत के सुप्रसिद्ध सामाजिक नेता श्री श्रीनिवास शास्त्री एक समय विश्वविद्यालय के कुलपति थे। अध्यापक छात्रों के दबाव में क्या कर रहे थे, तब अक्सर छात्र उनके पास जाते थे और वह दबावपूर्ण कर देते थे।

एक दिन सभी अध्यापक मिलकर शास्त्री जी के पास पहुंचे और कहा "हम बीमार करते हैं और आप उसे माफ कर देते हैं? इस प्रकार व्हाट्स बिग्रेडगा नहीं?"

शास्त्री जी ने सहानुभूति के साथ अध्यापकों की बात सुनी और उसका औचित्य भी माना। पर अपनी भावनागत कठिनाई बताते हुए उनसे कहा- "जब मैं छोटा था, तो बड़ी निर्धन स्थिति थी। साबुन खरीदने के लिए एक आना जब मेरे माता-पिता न जुटा सकी, तो मुझे मैले कपड़े पहनकर स्कूल जाना पड़ता था। इस पर अध्यापकों ने मुझे बहुत परेशान किया। आठ आने साबुन कर दिया। एक आना साबुन के लिए ही न था तो आठ आने वाले बर्तन कहां से देता? उनकी इस स्थिति का स्मरण मुझे हो आता है और छात्रों का दर्द सहन करने पर विवश होना पड़ता है। "

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